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जाति के जाल की कठिन बुनावट और उलझा हुआ बहुजन समाज

जाति के जाल की कठिन बुनावट और उलझा हुआ बहुजन समाज

कोई माने न माने ब्राहम्णवादी व्यवस्था के वर्चस्व में किसी प्रकार की कमी के लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं। हाँ! प्रकृति में बदलाव जरूर झलकता है। जिसका मूल कारण समूचे विश्व में शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर हो रहे प्रचार- प्रसार में निहित है। इस प्रकार का बदलाव केवल भारत में ही है, ऐसा नहीं है।  शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर हो रहे प्रचार-प्रसार से यह तो माना जा सकता है कि समाज  के दलित और दमित वर्ग में जागरूकता का ज्वार आया है। दूसरे ….भारत की सैंवाधानिक व्यवस्था से भारतीय राजनीति में जातियों को एकजुट और तो और …..और पुष्ट होने का प्रभाव बढ़ा है। चुनावी व्यवस्था में दलित जातियों के आरक्षण के चलते  विधा‍यिका में दलित-पिछड़े और आदिवासियों की संख्‍या बढी है, लेकिन भारतीय समाज के दलित-दमित वर्ग में जातीय अलगाव भी तेजी से बढ़ा है। जिसके चलते अनुसूचित/अनुसूचित जनजातियों का ध्रुवीकरण होने के बदले बिखराव ही उत्पन्न हुआ है…..प्रत्येक व्यक्ति में सत्ता में कुर्सी पाने का लालच इस कदर शीर्ष हुआ है कि वर्चस्वशाली राजनीतिक दलों की चाटुकारिता करके सत्ता में कुर्सी तो हासिल कर लेता है किंतु निजी स्वार्थों के चलते  सामाजिक-स्वार्थ गर्क में चले जाते हैं। इस तरह राजनीतिक-सत्ता दलित और दमितों के बिखराव के कारण बाबा साहेब अम्बेडकर के सपनों वाली दलितों और पिछड़ों क लिए सभी तालों की चाबी नहीं रह गयी है। सत्ता की ‘मास्‍टर की’ न केवल ब्राहम्णवादी शक्तियों के हाथों में बल्कि  अब तो  कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चली गई है। इस प्रकार राजनीति में अनुसूचित/अनुसूचित जन जातियों और पिछड़े वर्ग का समुचित प्रतिनिधित्व तो है किंतु उसका सत्ता के संचालन में कोई हस्तक्षेप नहीं के बराबर ही है।

 जहाँ तक  इतिहास में जाति से मुक्ति के लिए चले आंदोलनों का सवाल है तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि जाति से मुक्ति के लिए सदियों से अनेक आन्दोलन चलते रहे हैं किंतु समय के साथ-साथ सारे आन्दोलन  साम, दाम, दण्ड और भेद वाली नीतियों के शिकार होते रहे। हाँ! भारतीय समाज में लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व बौद्ध दर्शन ने ब्राह्मणवाद और जातियों से मुक्ति का मार्ग जरूर पशस्त किया जिसकी छाया/प्रतिछाया आज भी देखने को मिलती है। किंतु बुद्ध के निर्वाण के साथ ही केवल 300/400 वर्षों में ही बौद्ध संस्थाएं जातिवाद और ब्राह्मणों द्वारा अपनी श्रेष्ठता कायम रखने के लिए रचे गए सामाजिक-आर्थिक कुचक्रों के जाल में फंसकर मृतप्राय: हो गईं। यह कहना अतार्किक न होगा कि भारतीय समाज के कुटिल, बौद्दिक रूप से सम्भ्रात ब्राहम्णवादी शाक्तियाँ जाति से मुक्ति के प्रत्येक आन्दोलन के ताप को ठंडा करके अपने प्रभाव में ले लेती हैं।

आमजन की रुचि के साहित्यिक कर्म को साहित्यकार/लेखक/कवि विशेष की रुचि के रूप में भी देखा जा सकता है। उसकी अपनी रुचि के अनुसार उपजे साहित्य में यदि जाति मुक्ति के लिए कोई विशेष संदर्भ देखने को मिलते हैं तो यह एक संयोग ही माना जाएगा। हाँ! इतना अवश्य माना जा सकता है कि तथाकथित दलित साहित्य में ऐसे प्रकरण मिलते तो जरूर हैं किंतु वो समाज की दशा को ही ज्यादा दिखाते हैं, लेकिन उस दशा से उबरने या जाति से मुक्ति के सवाल या तो केवल कटाक्ष के रूप में या फिर केवल आलोचना के रूप में ही ज्यादा उभर हैं। तथाकथित दलित साहित्य के रचनाकारों की तो सबसे ज्यादा त्रिसादी ये रही है कि वे “दलित” शब्द को इतनी जोर से जकड़कर पकड़े हुए हैं कि यदि दलित शब्द को कहीं छोड़ दिया तो उनका साहित्यिक अस्तित्व व सामाजिक अस्मिता का ही ह्रास हो जाएगा। यदि ये कहा जाए कि ज्यादातर दलित साहित्यकार “दलित” शब्द के प्रयोग को ही अपनी मुक्ति का मार्ग मानते हैं। बड़े दुख से कहना पड़ रहा है कि सामाजिक/धार्मिक/आर्थिक बराबरी के लिए दलित जिस मैली-कुचैली जातीय चादर को उतार कर फैंक देना चाहते हैं, उसी मैली-कुचैली जातीय चादर को अपने साहित्य पर डालकर साहित्यिक क्षेत्र में शिखर पुरुष होने का मार्ग तलाशने में संघर्षरत हैं।

 इतना ही नहीं दलित साहित्यकार आजकल जातियों के खेमों में संगठित हो रहा है जिससे जातियों के और पुष्ट होने के प्रमाण ही मिलते हैं। इस खेमेबाजी के चलते “ दलित लेखक संघ” में भी टूट पड़ गई और “दलित लेखक संघ” की स्थापना का मूलभाव तमाशा बनकर रह गया है। ऐसे साहित्यकारों के इतर आजकल कुछ ऐसे दलित साहित्यकार भी सामने आए हैं जो दलितों के साहित्य को “दलित साहित्य” के रूप में स्वीकार न करके इसे “अम्बेडकरवादी साहित्य” के रूप में स्वीकार करते हैं। कहने को सामान्यत: “दलित-साहित्य” और “अम्बेडकर साहित्य” के प्रेरणा स्त्रोत केवल और केवल बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ही हैं। कहना न होगा कि आज दलित-समाज का बुद्धिजीवी वर्ग ही अपने समाज की अनदेखी करने में देखा जा रहा है।

इस कड़ी में विभिन्न सामाजिक नायकों, नामचीन लेखकों और चिंतकों के स्वतंत्र लेखन और उनके द्वारा नाना प्रकार से किए गए कामों को निश्चित रूप से जाति से मुक्ति के लिए स्वतंत्र परियोजना का नाम दिया सकता है।  इस संबंध में संत परंपरा से लेकर जोतिबा फुले, डा. अम्बेडकर, स्वामी अछूतानंद,  पेरियार जैसे महानायकों की एक बड़ी जमात है जिसका उल्लेख करना जरूरी जान पड़ता है किंतु डा. अम्बेडकर ने जिस व्यवस्थित व व्यापक रूप से सामाजिक परिवर्तन के जो मानदंड और आदर्श प्रस्तुत किए, वैसे उदाहरण कोई और मिलना असंभव जान पड़ता है। इनके द्वारा किए गए कामों में जाति से मुक्ति के लिए किया गया प्रत्येक संघर्ष मिलता है।

जहाँ तक मेरे अपने साहित्यिक कर्म में जाति से मुक्ति का मार्ग तलाशने की बात है तो मैं कहना चाहूँगा कि आत्मालोचना करना किसी भी साहित्यकार के लिए एक जोखिम भरा कार्य है। फिर भी इतना तो कह ही सकता हूँ कि मेरी अपनी लेखन शैली अमूमन दलित साहित्यकारों से अलग और गाली-गलौज से परे की लेखन-शैली है। जिस कारण से जनसासान्य में मेरे लेखन के प्रति शायद खिन्नता नहीं उपजती अपितु सामाजिक जुड़ाव का भाव ही उत्पन्न होता है। शायद इसलिए ही मैं साहित्यिक क्षेत्र में खेमेंबाजी से दूर अलग-थलग पड़ा दिखता हूँ।

कमोबेश यही हालत दलित राजनीति की भी है।बहुजन समाज में बसपा के अतिरिक्त अनेक राजनीतिक दल भी मैदान उतरने का दम भर रहे हैं। विदित हो कि रिपब्लिक पार्टी के बाद बसपा ने बहुजनों के लिए जो काम किया, वैसा अन्य  कोई अन्य बहुजन  समाज को एक करने के बजाय अन्यंय राजनीतिक दल बनाकर बहुजनों के वोटों को छितराने का काम कर रहे हैं। और यही कांग्रेस और भाजपा चाहती भी है। यह भी कि बहुत से बहुजनों को कुछ न कुछ लोभ देकर बहुत सी जेबी राजनीतिक पार्टियों का सृजन कराने का काम करती हैं ताकी बहुजनों और ओबीसी के वोट बैंक कहीं एकजुट न हो जाएं। कमाल की बात तो ये है कि बहुजनों के राजनीतिक दल आपस में ही एक दूसरे की टाँग खिचने में लगे रहते है। या यूं कहे कि बहुजन समाज के जेबी राजनीतिक दल ही बहुजनों को बाँटने पर तुले हैं।)

मेरे लिए तो यह कहना अति कठिन कार्य है कि मौजूदा कालखण्ड की राजनीतिक/ साहित्यिक गतिविधियों में समाहित जातिगत उटा-पटक से भारतीय समाज में जातियां कमजोर हो रही हैं……..उल्टे और मजबूत हो रही हैं। कारण है कि मौजूदा राजनीति केवल और केवल धर्म और जातियों की गुटबन्दी/जुगलबन्दी पर आधारित है। इस प्रकार ब्राह्मणवाद का उद्देश आज भी स्थाई बना हुआ है। केवल उसका वर्चस्व और उसकी रणनीति समय के साथ बदलती रहती है। साम, दाम, दण्ड और भेद वाली नीतियां आज भी जिन्दा हैं। किंतु दलित राजनीति बिखरती जा रही है। ये भी कहा जा सकता है बहुजन समाज अपने ही जाल में फंसता जा रहा है।

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