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चुनौतियों के कितने और चक्रव्यूह भेदेंगे अखिलेश यादव

चुनौतियों के कितने और चक्रव्यूह भेदेंगे अखिलेश यादव

ज्यों ही सुना स्वामी प्रसाद मौर्या जी भी अखिलेश से नाराज हो गए। त्योही अंतरात्मा से तुरंत आवाज आई, अरे ए जवान लड़का कितने को झेलेगा? और कितनों को सम्हालेगा? हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की। अखिलेश को जितना भाजपा से लड़ना पद रहा है उससे कहीं ज्यादा आज उनसे लड़ना पद रहा है जिन्हे वह अपना समझते हैं या फिर जिन अपनों के लिए वह लड़ रहे हैं।

स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफे की बात सुनकर मैं पुरानी यादों में चला गया। इन यादों में अखिलेश के अनेक दर्द तैरते मिले सौतेली मां को झेला, बाप से राजनीतिक पंगा लिया, चाचा से भिड़ंत हो गई, कम उम्र में बाप से बगावत करके राजनीतिक विरासत पा गया, इसलिए महत्त्वाकांक्षा में भतीजे से चाचा लोग नाराज हो गए। राजनीति की लाइन में खड़ा पूरा परिवार नाराज हो गया। सिर्फ पब्लिक नें साथ दिया, इसलिए सबको झेल लिया।

बाप ने बिरासत में सामंतवाद से ओतप्रोत समाजवाद पर आधारित राजनीतिक पार्टी दिया, जिसके संस्थापकों में ठाकुर और ब्राह्मण भी थे। भाजपा के ब्राह्मणवाद से कयी बार अपमानित होने पर, उनसे बदला लेने और बहुजन समाज का वोट पाने के लिए, कांशीराम और अंबेडकरवाद की तरफ झुकाव होने लगा। दो रास्ते पर चलने की कोशिश करने लगे। एक तरफ सामंतवादी सपाई प्रतिक्रिया में नाराज होते हुए, परशुराम का मंदिर और हाथ में कटार देने की कोशिश करने लगे। दूसरी तरफ अखिलेश अंबेडकरवादी विचार को पढ़ने,  समझने और भारतीय संविधान की बात करने लगे।  बदलाव की राह पकड़ने पर, अंबेडकरवादियों से, स्वागत के बजाय विरोध और राजनीतिक कटाक्ष झेलना पड़ा। अखिलेश जी एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में संविधान नहीं चलेगा कुछ लोग तो ऐसे नांक सिकोड़कर कह रहे थे, जैसे मानो, कि बाबासाहेब और संविधान पर सिर्फ उन्ही का हक है।

व्हाट्स से प्रशक्षित दलित समाज कहता है कि इनके मुख्य मंत्री काल में सबसे ज्यादा दलितों पर अत्याचार हुआ था। इनकी यादव जाति के लोगों ने दलितो तर अत्याचार सबसे ज्यादा किया है। यह एक भ्रामक प्रचार है। इस तरह का मानसिक अत्याचार तो मैं भी झेल रहा हूं। मैं जब इस पर सवाल करता हूं कि,  क्या मैं भी सिर्फ यादव होने के कारण, ऐसा अत्याचार किसी दलित पर कर सकता हूं? तो लोग चुप हो जाते है, कोई जवाब नही दे पाते है? सही कारणो का पता लगाए बिना पूर्वाग्रह से तरह तरह के दोष मढ़ दिये जाते है। दबंग जातियों का एक दूसरे के ऊपर अत्याचार का कारण, उस जाती का आदमी नही, हिन्दू-धर्म के तथाकथित  आदर्श गुण, ब्राह्मणवाद के कारण होता है। ऐसी घटनाओं के अत्याचार को भी अखिलेश को ही झेलना पड़ता है।

एक पुराना वीडियो अखिलेश जी के मुख्यमंत्रित्व समय का, अभी भी, कभी- कभार सोशल मीडिया में आ जाता है। मुझे बहुत व्यथित करता है। पुलिस थाने में सैकड़ो पब्लिक और कुछ पुलिस के सामने एक दम्पत्ति खड़े नंगें दिखाई दे रहे है, औरत का पेटीकोट दोनों पैरो के बीचोंबीच गिरा हुआ है,  साफ दिखाई दे रहा है कि वह औरत, हो सकता है, प्रशासनिक लापरवाही के कारण प्रोटेस्ट में, अपने आप कपड़ा उतारा हो, कारण कुछ भी रहा होगा। घटनाक्रम निन्दनीय है, लेकिन प्रचार होता है कि अखिलेश यादव के यादव दरोगा ने, पुलिस थाने में दलित महिला को नंगा करके घुमाया। जब कोई यादव से या अखिलेश से नाराज होता है तो, यह वीडियो सोशल मीडिया में घूमने लगता है। यह अखिलेश के नाम पेटेंट हो गया है, इसे भी उस बेचारे को ही झेलना पड़ता है। चाहे उससे भी दर्दनाक घटनाएं आज क्यों न घटित हो रही हो।

सोशल मीडिया पर बार बार सवाल उठता है कि, अखिलेश सभी जातियों को बराबर की हिस्सेदारी और उनको मान सम्मान नही देते है। इसलिए लोग भाजपा में, या इधर उधर भाग जाते है। सवाल का जवाब आने पर कि, इसकी गारंटी कौन लेगा कि? जीतने के बाद कोई भाजपा में या इधर उधर नही जाएगा ?  इसका जवाब किसी के पास नही रहता है? फिर भी अखिलेश ही जिम्मेदार हैं। यह सब अखिलेश को ही झेलना और सम्हालना है।

कभी उनकी पार्टी के यादवो नें वगावत किया, अपनी जाति की पार्टी बनाई।  ब्राह्मणों और ठाकुरों ने भी बगावत की। लौटन राम निषाद ने बगावत किया, फिर समझा -बुझाकर वापस ले आए।  लेकिन दूसरे निषाद ने तो बगावत करके पार्टी बनाकर भाजपा के साथ जाकर अपने समाज की जडो को खोद रहे हैं। राजभर ने पार्टी छोडी, पटेल ने बगावत किया। बहुजन समाज हित में, बहुत कोशिशो के बाद, कांशीराम जी का सपना पूरा करने के लिए बहन जी से समझौता हुआ,  वह भी बिना कारण टूट गया। कुछ दिन पहले अटूट गठबंधन माने जाने वाले जाट नेता भी गठबंधन तोड़कर भाजपा में चले गए।

सभी बगावत, पार्टी छोडने के लिए या गठबंधन तोड़ने के लिए अखिलेश को ही जिम्मेदार ठहराया गया है। लगता है, सबको झेलने और सम्हालने की जिम्मेदारी सिर्फ अखिलेश की ही है। दूसरी पार्टियां या जो अखिलेश से अलग हो जाती है, वे सभी भाजपा के साथ ही गठबंधन क्यों करती है? कांग्रेस के साथ क्यों नहीं? वे लोग भाजपा से आमने सामने टक्कर क्यों नही लेते हैं ? भाजपा का विकल्प क्यों नही बनती है? भाजपा में ही क्यो शामिल होती है?

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स्वामी प्रसाद मौर्या और अखिलेश यादव

अभी अभी लोकसभा चुनाव नजदीक आते ही अखिलेश यादव को तगड़ा झटका देते हुए, स्वामी प्रसाद मौर्य जी ने बगावत कर दिया। मीडिया में या समाज में, कोई ज्यादा आश्चर्य की बात सामने नही आई। भाजपा के शासन काल में चुनाव आते समय ऐसी अदला बदली तो एक आम बात हो गई है। कारण भी लोग अपने तरीके से जानने और समझने लगे है।

एक महीने पहले सोशल मीडिया में एक वक्तव्य पढ़ा था कि,  स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा के एजेंट हैं,  सपा के हिन्दू-धर्म के पिछड़ी जाति के वोटरो को भाजपा की तरफ मोडने के लिए, हिन्दू-धर्म के खिलाफ अनाप-शनाप बोलते हैं। इसको मैंने ज्यादा तवज्जो नही दिया था, बल्कि समझा कि मौर्य जी के पापुलरटी से इनको जलन हो सकती है।

मौर्य जी का पहला और गंभीर आरोप कि, मै पार्टी का महासचिव हूं, मेरे वक्तव्य को पर्सनल वक्तव्य बता दिया जाता है। मौर्य जी यह सभी पार्टियां ऐसे ही बचाव करती है। एक तरह से आप का भी बचाव किया गया है।  क्या सपा में आप की तरह कई लोग आप की नकल करते हुए भाषण देते है, यदि ऐसा है, और सिर्फ आप के वक्तव्य को पर्सनल कहा जाता है,  तब गलत है और आप सही हो।

सदियों से धार्मिक मान्यताओं, यादव समाज एवं और अन्य पिछड़ी जातियों की सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए, यह आप की धार्मिक विरोधी बात कुछ हद तक सही हो सकती है, लेकिन पार्टी की विचारधारा, उसकी नीतियों पर सम्हलकर चलना, एक दो बार टोकने या इशारा करने के बाद भी क्या आप की  जिम्मेदारी नही बनती है ? क्या उसी बात को दोहराना अनुशासनहीनता नही है। कई पत्रकारों से सवाल पूछने पर अखिलेश ने हर बार आप का बचाव किया है, यहां तक कि आप के खिलाफ बोलने पर कुछ सवर्ण नेताओ पर कार्रवाई भी किया है। आप क्या चाहते है कि सबको नराज करके सिर्फ आप को खुश रखा जाए।

आप को बता दूँ कि, सैफई परिवार से ही मुझे जानकारी मिली कि,  अखिलेश द्वारा गर्व से कहो हम शूद्र है बैनर लगाने पर,  हरियाना,  मध्य प्रदेश और कुछ पश्चिमी उत्तर भारत के यादव लोग बहुत नाराज हो गए थे और भाजपा में एकमुश्त जाने की धमकी दे रहे थे। सैफई परिवार पर बहुत दबाव डाला जा रहा था। इसलिए पीछे हटना पड़ा। मैं भी नाराज हुआ था। मेरी राय में तो, तत्काल के परिणाम को इग्नोर करते हुए, भविष्य की राजनीति को देखते हुए, अखिलेश को पीछे नही हटना चाहिए था।

अखिलेश से  मिलकर इस विषय पर चर्चा करने का भी मन हुआ था, लोगों का कहना था कि निजी तौर पर अखिलेश शूद्र मिशन से प्रभावित हैं। लेकिन इस मिशन से फिलहाल यादव समाज के साथ अन्य पिछड़ी जातियो का कुछ वोट भाजपा में चले जाने का डर सता रहा है। इसलिए फिलहाल दूर रहने में भलाई है।  मेरा भी अनुभव और अनुमान है की सामाजिक परिवर्तन के लिए सिर्फ नेता ही दोषी नही है बल्कि समाज ज्यादा जिम्मेदार है।

एक सवाल और है, क्या मौर्य जी ऐसा ही भाषण कांग्रेस,  बसपा, भाजपा या यदि खुद की पार्टी बनाने पर, सार्वजनिक मंच से बोल सकते है?

फिर भी सभी उतार-चढ़ाव की जिम्मेदारी बिचारे अखिलेश को ही झेलना पड़ता है।

बगावत की एक तस्वीर और उसका दूरगामी परिणाम,  देना उचित समझता हूं

सामाजिक और धार्मिक रूप से पिता  प्रबोधन ठाकरे के विपरीत इनकी विचारधारा थी। जुझारू, कर्तव्य के प्रति जिद्दी स्वभाव, नये कार्यकर्ताओं को लेकर, उन्हे अपने तरीके से ट्रेनिंग देकर, एक मजबूत पार्टी खड़ी कर दी। शाखा प्रमुख से लेकर जिला स्तर तक समर्पित, अपने नेता के लिए मरने-मारने पर उतारू, ऐसा पूरे महाराष्ट्र में संगठन और नेता पैदा कर दिया। बगावत करने वालो की खैर नहीं,  किसी ने सोचा या किया तो उसकी अच्छी खातिरदारी के साथ दवा भी दी जाती थी। इसी अनुशासन से, जिला स्तर से लेकर राज्य भर में शासन प्रशासन में भागीदारी मिलने लगी।  महाराष्ट्र और मुम्बई मे वर्चस्व स्थापित कर लेने के बाद, इतिहास में पहली बगावत छगन भुजबल की कांग्रेस के सहयोग से सफल हो गई।  उसे दबाने या रोकने मे बाला साहब असफ़ल हो गये।  उसके बाद से बगावत का सिलसिला चालू हो गया। परिणाम आप सबके सामने है।  आज पार्टी दयनीय हालत मे पहुंच गई है। मेरा अनुमान है कि, यदि बाला साहब उस समय छगन बुजवल की बगावत को रोकने मै सफल हो गए होते तो, आज महाराष्ट्र पर शिवसेना का एकछत्र राज होता।

आज भाजपा से बगावत नही है,  लेकिन भाजपा दूसरी पार्टियों में बगावत करवाती है।

अखिलेश जी आज की परिस्थिति में,  आप अपनी पार्टी से बगावत रोक नही सकते है। इतना बगावत झेलने के वाबजूद, आप के विरोधी कभी-कभार आप को भी भाजपा की बी टीम का लेवल लगा देते है। यदि सही है तो, इसे भी आप को ही झेलना और सम्हालना है।

झेलने और सम्हालने की भी एक लिमिट होती है, एक कहावत भी है कि रबर को भी एक लिमिट से ज्यादा  स्ट्रेच करोगे तो वह भी टूट जाता है।

मेरा अनुमान है कि आज की स्वार्थी, लालची, धमकी, ब्लैकमेलिंग, डरानेवाली राजनीतिक स्थिति में किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता है, पास्ट की परिस्थितियों के कारण उनको पूरा दोषी भी नहीं कहा जा सकता है। संवैधानिक रूप से जीती हुई सरकारें ब्लैकमेल हो जा रही है।  बिहार और महाराष्ट्र इसके ताजा उदाहरण है। क्या गारंटी है कि थोडी मार्जिन से जीतने के बाद भी आप सरकार चला पाएगें? तब और ज्यादा झेलना पड़ेगा?

हमारी उम्र तो ढलान पर है, आप को अभी बड़ी और लम्बी लड़ाई लड़नी है।  यदि आप को लगता है कि इस नयी बिमारी बगावत से राजनीतिक रूप से अपने दुश्मन भाजपा को मात नहीं दे सकते है तो, सामाजिक रूप से मात देने में सफल हो सकते है।

आप को पता है कि भाजपाई इतना निचले स्तर पर गिरकर सिर्फ ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद के वर्चस्व को फिर से प्रस्थापित करना चाहते है, तो आप सिर्फ सामाजिक स्तर पर इनको मात दे सकते है। सिर्फ आप के आफिस के बाहर दो तीन बैनर लगाने से,  सड़क से लेकर संसद तक सबकी बोलती बंद हो गई थी, आप खुद इसका अनुभव कर चुके हैं।  यदि हर गली चौराहे पर लग जाए तो सोचिए क्या होगा? आप का असली दुश्मन ब्राह्मणवाद धराशाई हो जाएगा, शूद्रों में भाईचारा बनेगी, फिर दुश्मन की बगावत की गणित भी फेल हो जाएगी। इसके बाद शूद्रों का स्थाई शासन प्रशासन होगा।

मुझे मालूम है आप के लिए बहुत कठिन काम है,  कठिन काम को चैलेंज देने की क्षमता भी आप में है।  परिवार से इसके लिए बगावत करना पड़ेगा, मुझे भी करना पड़ा है। 

सदियों से प्रतिष्ठापित सामाजिक बुराई को समाप्त करने के लिए, यदि अपनो से बगावत करना पड़े तो, निःसंकोच कर डालो। उचित और नेक काम है।

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